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#Comet(पुच्छल तारा )
# Article by shobhit sawale




आपको यह जानकर हैरानी होंगी
स्वान नाम का पुच्छल तारा ( SWAN Comet) मई के महीने में पृथ्वी के पास से गुजरने वाला है.
उम्मीद की जा रही है कि आगामी 13 मई को यह पृथ्वी से  बहुत साफ दिखाई देगा क्योंकि इसी तारीख को यह पृथ्वी के सबसे नजदीक होगा और तभी यह सबसे साफ दिखाई भी देगा वह भी बिना किसी यंत्र के।
यह तारा दक्षिणी गोलार्ध में यह ज्यादा साफ और स्पष्ट दिखेगा। पर ये दुखद है कि भारत के लोग इस धूमकेतु को खुली आखों से नहीं देख सकेंगे। इसकी वजह ये हैं कि धूमकेतु स्वान भूमध्य रेखा के दक्षिण से होकर गुजरेगा, इसलिए धरती पर जो लोग दक्षिण में रहते हैं वहीं इसे देख सकेंगे। बलकि भारत भूमध्य रेखा के उत्तर में है। ऐसे में भारत के लोग इसे दूरबीन से देख सकते हैं।यह पुच्छल तारा  दक्षिणी गोलार्द्ध के लोगों को ज्यादा साफ दिखाई देगा।
यह पुच्छल तारा मई के मध्य में दिखाई दे सकता है. वहीं उत्तरी गोलार्ध में वह इस महीने के अंत में दिखाई दे सकता है.

#पुच्छल तारे (swan comet ) के बारे मे-:
स्वान पुच्छल तारा धरती से करीब 7.5 करोड़ मील दूरी से होकर गुजरेगा. यह इस समय बहुत  चमकीला दिखाई देगा।  इसकी चमक हरे रंग की होंगी , लेकिन  इसकी पूंछ नीले रंग की होंगी।  पुच्छल तारे भी क्षुद्रग्रह की तरह सूर्य के चक्कर लगाते हैं,उनकी भी एक अपनी  कक्षा होती है।  जहां क्षुद्रग्रह चट्टान से बने होते हैं, वहीं पुच्छल तारे गैस, धूल और बर्फ से बने होते हैं। इनकी पूंछ होती है जो हमेशा सूर्य से विपरीत दिशा में होती है.

#पुच्छल तारे की खोज -:


कॉमेट स्वान को सोलर हेलियोस्फेरिक ऑबजर्वर (SOHO) अंतरिक्ष यान के सोलर विंड एनिसोट्रोपिस (SWAN) नाम के कैमरा से ली गईं तस्वीरों से सबसे पहले खोजा गया था।  यह खोज इसी साल मार्च 25 को हुई थी।

#पुच्छल तारे (comets) क्या होते है?

पुच्छल तारा को धुमकेतु भी कहा जाता है।

Comet शब्द, ग्रीक शब्द komētēs से बना है जिसका अर्थ होता है hairy one बालों वाला। यह इसी तरह दिखते हैं इसलिये यह नाम पड़ा।



पुच्छल तारा आकाश में चमकने वाले तारे है, यह ग्रहों और दूसरे उपग्रहों से अलग होता है। पुच्छल तारे भी सौर मंडल की सदस्य व सूर्य की परिक्रमा करते है। पुच्छल तारा एक सिर और एक पूंंछ जैसे दिखाई देती है। पुच्छल तारा परिक्रमा करते हुए वह पृथ्वी के पास हजारों वर्ष बाद आता है और आते हुए वह आकाश मे चूर चूर हो जाता है। फलस्वरूप उसकी धुल धरती पर गिरती है जो हमें चमकता हुआ दिखाई देता है। पुच्छल तारे धूल, गैस व चट्टान से मिलकर बनता है। इसमें अमोनिया, जलवाष्प, मीथेन गैस होता है।
सूर्य से दूर जाने पर धूल और बर्फ पुन: इसके नाभिक में जम जाती है। हर बार जब यह सूर्य के पास आता है तो कुछ न कुछ इनकी धूल और बर्फ बिखर जाती है जिसके कारण इनकी पूंछ छोटी होती जाती है और अक्सर यह पूंछ विहीन हो जाते हैं। यह धूमकेतु सूर्य के समीप आने पर भी पूँछ को प्रकट नहीं करते हैं।ऎसे धूमकेतुओं को पुच्छहीन धूमकेतु कहते हैं। इस समय यह क्षुद्र ग्रह (Asteroids )की तरह लगते है।
इसकी संख्या सौरमंडल में हजारों है।